बंगाल का नव-अभ्युदय: तुष्टिकरण के अंधकार से विकास के सूर्योदय तक की ऐतिहासिक यात्रा
प्रस्तावना: एक युग का अंत, नई चेतना का उदय
लेखक: कन्हैयालाल दुबे
मई 2026 की ऐतिहासिक सुबह ने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक क्षितिज पर उस परिवर्तन की इबारत लिख दी है, जिसकी प्रतीक्षा दशकों से की जा रही थी। बंगाल की धरती, जो कभी 'वंदे मातरम' के उद्घोष से पूरे देश को जागृत करती थी, पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार और पक्षपाती शासन की प्रयोगशाला बन गई थी। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया है कि लोकतंत्र में जनता की सहनशक्ति अटूट नहीं होती। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के पतन और भारतीय जनता पार्टी के सत्तारूढ़ होने के साथ ही बंगाल में न केवल सत्ता बदली है, बल्कि शासन का वह 'नरेटिव' भी बदल गया है जिसने वर्षों तक बहुसंख्यक समाज को दोयम दर्जे का नागरिक महसूस कराया था। यह केवल एक दल की हार नहीं, बल्कि उस विचारधारा की पराजय है जिसने धर्म को विकास से ऊपर और वोट बैंक को राष्ट्रहित से ऊपर रखा।
अतीत का काला अध्याय: तुष्टिकरण की राजनीति और हिंदू प्रताड़ना
पिछला डेढ़ दशक बंगाल के इतिहास में एक ऐसे दौर के रूप में दर्ज किया जाएगा, जहाँ राज्य का प्रशासनिक तंत्र एक वर्ग विशेष के हितों का रक्षक बन गया था। ममता सरकार पर आरोप नहीं, बल्कि यह कड़वी सच्चाई थी कि बजट का एक असंतुलित हिस्सा अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर उन क्षेत्रों में बहाया गया, जहाँ केवल चुनावी फसल काटनी थी। जब इमामों के लिए वजीफे और मदरसों के लिए असीमित फंड की घोषणा की गई, तो उसी समय राज्य के प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक और सामान्य छात्र बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे थे।
इससे भी भयावह थी वह 'सांस्कृतिक प्रताड़ना', जिसे बंगाल के हिंदू समाज ने मूक रहकर सहा। दुर्गा पूजा के विसर्जन पर रोक लगाने की कोशिशें हों या रामनवमी के जुलूसों पर सत्ता संरक्षित भीड़ का हमला, प्रशासन ने हमेशा पीड़ितों को ही कठघरे में खड़ा किया। संदेशखाली जैसे क्षेत्रों से आई महिलाओं की चीखें इस बात का प्रमाण थीं कि कैसे एक विशेष वोट बैंक को खुश करने के लिए महिलाओं की अस्मत और मानवाधिकारों को कुचल दिया गया। हिंदुओं के विरुद्ध हुई इस संगठित प्रताड़ना ने बंगाल के सामाजिक ताने-बाने में जो दरार पैदा की थी, वह 2026 के जनादेश के रूप में एक ज्वालामुखी बनकर फूटी। जनता ने स्पष्ट संदेश दिया कि वे अब अपनी ही माटी पर 'शरणार्थी' जैसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं करेंगे।
सिंडिकेट राज और आर्थिक पतन का दौर
बंगाल की वर्तमान आर्थिक स्थिति किसी आपदा से कम नहीं रही है। 'कट मनी' और 'सिंडिकेट' के आतंक ने राज्य में नए निवेश के सारे दरवाजे बंद कर दिए थे। जिस बंगाल ने कभी देश की कुल जीडीपी में अग्रणी भूमिका निभाई थी, वह तृणमूल के शासन में ऋण के भारी बोझ तले दब गया। रोजगार के अभाव में राज्य के लाखों शिक्षित युवा बेंगलुरु, नोएडा और हैदराबाद जैसे शहरों में पलायन करने को मजबूर हुए। उद्योगों की जमीन पर राजनीतिक दफ्तर बन गए और सरकारी नौकरियों की नीलामी 'शिक्षक भर्ती घोटाले' जैसे कांडों के माध्यम से खुलेआम हुई। भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी थीं कि मुख्यमंत्री के करीबी मंत्रियों के घरों से करोड़ों की नकदी का निकलना एक सामान्य बात हो गई थी। जनता इस लचर और लुटेरे तंत्र से मुक्ति के लिए छटपटा रही थी।
परिवर्तन का नया सवेरा: भाजपा सरकार और 'सोनार बांग्ला' का संकल्प
अब जब भाजपा ने राज्य की बागडोर संभाली है, तो यह केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी का परिवर्तन नहीं है, बल्कि बंगाल की आत्मा की पुनर्स्थापना का प्रयास है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस प्रशासनिक ढांचे को दुरुस्त करना है, जो पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग चुका था। नई सरकार का पहला संकल्प 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास' होना चाहिए, जहाँ बजट का आवंटन मजहब के आधार पर नहीं बल्कि गरीबी और आवश्यकता के आधार पर हो।
बंगाल के लोगों को अब उम्मीद है कि उनके त्योहार बिना किसी डर के मनाए जाएंगे और उनकी सांस्कृतिक पहचान का उपहास नहीं उड़ाया जाएगा। नई सरकार को तुष्टिकरण की उन तमाम नीतियों को पलटना होगा जिन्होंने समाज में विभाजन पैदा किया। 'सोनार बांग्ला' के सपने को साकार करने के लिए निवेश के अनुकूल वातावरण बनाना, बंद पड़ी जूट मिलों को पुनर्जीवित करना और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बंगाल को वैश्विक मानचित्र पर लाना अनिवार्य है।
चुनौतियां और भविष्य की राह
सफर आसान नहीं है। पिछली सरकार ने विरासत में एक खाली खजाना और एक डरा हुआ प्रशासन छोड़ा है। इसके अलावा, सीमा पार से होने वाली घुसपैठ और जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Change) की चुनौतियां राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा बनी हुई हैं। नई सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर केंद्र के साथ समन्वय बिठाकर घुसपैठ पर लगाम लगानी होगी। साथ ही, राजनीतिक हिंसा के उस चक्र को तोड़ना होगा जिसे वामपंथियों ने शुरू किया और तृणमूल ने चरम पर पहुँचाया।