न्याय की तराजू झुकी — हत्यारों को आजीवन कारावास।।
गैंगस्टर एक्ट मामले में भदोही की विशेष अदालत का ऐतिहासिक फैसला, नौ दोषियों को सश्रम कारावास एवं अर्थदण्ड
संवाददाता कन्हैयालाल दुबे
भदोही/ज्ञानपुर, 11 मई 2026। न्याय की प्रतीक्षा में तीन वर्षों से आँखें बिछाए बैठे एक परिवार को आज सुकून मिला। विशेष अपर सत्र न्यायाधीश/पाक्सो प्रथम/गैंगस्टर अधिनियम न्यायालय, ज्ञानपुर-भदोही के न्यायाधीश लोकेश कुमार मिश्रा (एच.जे.एस.) ने मुकदमा अपराध संख्या 74 सन् 2023 में नौ दोषियों को आजीवन सश्रम कारावास सहित कठोर दण्ड सुनाया। यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय का प्रतीक बना, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि अपराध चाहे जितना सुनियोजित हो — कानून की पहुँच से कोई नहीं बच सकता।
वह काली रात जब बुझ गया एक दीपक
मामला 9 मई 2023 की रात का है। ग्राम शुकुलपुर (हरिहरपुर), थाना ज्ञानपुर, जनपद भदोही में रात लगभग साढ़े नौ बजे पुरानी रंजिश की आग में झुलसे कुछ लोगों ने सुनियोजित हमले को अंजाम दिया। ग्राम निवासी सूर्यनारायण शुक्ला के भतीजे त्रिवेणी प्रसाद शुक्ला और उनके पुत्र वेदप्रकाश शुक्ला पर सुरेश शुक्ला एवं उनके साथियों ने लाठी, डंडे और हॉकी से जानलेवा हमला कर दिया।
इस नृशंस हमले में त्रिवेणी प्रसाद के सिर पर गहरा घाव आया और वेदप्रकाश भी गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों को तत्काल जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से ट्रामा सेंटर वाराणसी रेफर किया गया। पाँच दिन तक मौत से जूझने के बाद 14 मई 2023 को त्रिवेणी प्रसाद शुक्ला ने अंतिम साँस ली और एक परिवार हमेशा के लिए अधूरा हो गया।
नौ आरोपी — एक गाँव, एक षड्यंत्र
इस जघन्य अपराध में जिन नौ अभियुक्तों को कटघरे में खड़ा किया गया, वे सभी ग्राम शुकुलपुर हरिहरपुर, थाना ज्ञानपुर के निवासी हैं। इनमें सुरेश शुक्ला पुत्र राममूर्ति शुक्ला, शैलेन्द्र उर्फ सत्यम शुक्ला, धर्मेन्द्र उर्फ सुन्दरम शुक्ला (दोनों पुत्र राकेश्वर शुक्ला), सर्वेश शुक्ला व विकास उर्फ राहुल शुक्ला (दोनों पुत्र रामेश्वर शुक्ला), आकाश शुक्ला पुत्र विन्ध्यवासिनी शुक्ला तथा विन्ध्यवासिनी शुक्ला, जलनी शुक्ला व संतोष शुक्ला (तीनों पुत्र स्व. मुरलीधर शुक्ला) शामिल हैं।
इन सभी पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 147, 323/149, 325/149, 302/149, 307/149, 504, 506 तथा 7 सी.एल.ए. एक्ट एवं उत्तर प्रदेश गैंगस्टर अधिनियम की धारा 3(1) के अन्तर्गत अभियोग पंजीबद्ध किया गया था।
तीन वर्षों की न्यायिक यात्रा
प्रथम सूचना रिपोर्ट 10 मई 2023 को दर्ज की गई। विवेचना पूर्ण होने के उपरांत आरोप पत्र न्यायालय में प्रेषित किया गया। अपर सत्र न्यायाधीश, भदोही-ज्ञानपुर द्वारा 9 जनवरी 2024 को प्रसंज्ञान लिया गया। माननीय सत्र न्यायालय के आदेशानुसार पत्रावली 15 अप्रैल 2025 को इस न्यायालय को प्राप्त हुई। तत्पश्चात 2 जुलाई 2024 को समस्त अभियुक्तों पर आरोप विरचित किए गए, जिन्हें पढ़कर सुनाया गया और अभियुक्तों ने अस्वीकार कर विचारण की माँग की।
साक्ष्य का अटूट किला
अभियोजन पक्ष ने अपना मामला सिद्ध करने के लिए 16 गवाहों के बयान दर्ज कराए तथा 32 से अधिक दस्तावेजी साक्ष्य एवं 13 वस्तु प्रदर्श प्रस्तुत किए। इनमें प्रथम सूचना रिपोर्ट, मृत्यु प्रमाण पत्र, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, सीटी स्कैन रिपोर्ट, घटनास्थल का नक्शा नजरी, फर्द बरामदगी (तीन लाठी एवं एक हॉकी) तथा आपराधिक इतिहास संबंधी अभिलेख प्रमुख रहे।
बचाव पक्ष की ओर से 11 गवाह एवं 12 दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। अभियुक्तों ने धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत समस्त आरोपों को नकारते हुए स्वयं को निर्दोष बताया और कहा कि उन्हें झूठे मुकदमे में फँसाया गया है।
न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय
न्यायाधीश लोकेश कुमार मिश्रा ने समस्त साक्ष्यों, तर्कों एवं परिस्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण करने के उपरांत सभी नौ अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 147, 323/149, 325/149, 302/149 तथा 307/149 के अपराध में दोषसिद्ध घोषित किया। हालाँकि धारा 504, 506 भा.द.वि., 7 सी.एल.ए. एक्ट तथा गैंगस्टर अधिनियम की धारा 3(1) के आरोपों से सभी को दोषमुक्त किया गया।
दण्डादेश इस प्रकार रहा —
धारा 302/149 के अन्तर्गत आजीवन सश्रम कारावास एवं 25,000 रुपये अर्थदण्ड, धारा 307/149 में 7 वर्ष सश्रम कारावास एवं 4,000 रुपये, धारा 325/149 में 3 वर्ष सश्रम कारावास एवं 2,000 रुपये, धारा 323/149 में 6 माह सश्रम कारावास एवं 500 रुपये तथा धारा 147 में 1 वर्ष सश्रम कारावास एवं 1,000 रुपये अर्थदण्ड। अर्थदण्ड न चुकाने पर अतिरिक्त कारावास का प्रावधान भी रखा गया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएँ साथ-साथ चलेंगी और अभिरक्षा में व्यतीत समय को कारावास में समायोजित किया जाएगा।
न्यायिक दर्शन — दण्ड केवल प्रतिशोध नहीं
न्यायाधीश ने अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों — एलिस्टर एन्थोनी परेरा बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (2012) 2 SCC 648 तथा Dr. Jacob George Vs. State of Kerala 1994 (SC) — का उल्लेख करते हुए कहा कि दण्ड का उद्देश्य निवारक, सुधारात्मक, निरोधात्मक एवं प्रतिकारात्मक होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता तथा उसे कारित करने के तरीके को ध्यान में रखते हुए ही दण्ड की मात्रा निर्धारित होती है।
अधिवक्तागण
अभियोजन पक्ष की ओर से विद्वान जिला शासकीय अधिवक्ता श्री श्याम सूरत पाण्डेय, श्री सत्यप्रकाश पाण्डेय तथा श्री तेज बहादुर यादव एडवोकेट उपस्थित रहे। बचाव पक्ष की ओर से श्री ए.एन. सिंह, श्री नन्दलाल शुक्ला, श्री अशोक मिश्रा, श्री हंसाराम शुक्ला, श्री नारायण जी उपाध्याय एवं श्री रामकृष्ण द्विवेदी एडवोकेट उपस्थित रहे।
आगे की कार्यवाही
न्यायालय ने आदेश दिया कि सभी दोषियों को सजायाबी वारण्ट बनाकर जिला कारागार भेजा जाए। जमानत पर रहे अभियुक्तों को तत्काल अभिरक्षा में लिया गया और जमानतदारों को उन्मोचित किया गया। जब्त माल को अपील अवधि के पश्चात न्यायालय के आदेशानुसार विनष्ट किया जाएगा। निर्णय की प्रति जिला कारागार अधीक्षक एवं जिला मजिस्ट्रेट को प्रेषित की जाएगी।
यह निर्णय आज 11 मई 2026 को न्यायाधीश लोकेश कुमार मिश्रा, विशेष अपर सत्र न्यायाधीश/पाक्सो प्रथम/गैंगस्टर अधिनियम, ज्ञानपुर-भदोही (J.O. Code-UP03839) द्वारा खुले न्यायालय में सुनाया और हस्ताक्षरित किया गया।।