देशभर में कागजी विकास और प्यास से तड़पते बेजुबान: देश के लाखों तालाबों के भ्रष्टाचार पर कब गिरेगी गाज?
कन्हैयालाल दुबे
संपादकीय:
जल संरक्षण और ग्रामीण विकास के दावे हर वर्ष सरकारी विज्ञापनों और फाइलों के पन्नों पर तो एक गौरवशाली गाथा की तरह अंकित होते हैं, लेकिन जब सूरज की तपिश बढ़ती है और धरती का सीना फटने लगता है, तब इन दावों की हकीकत सामने आ जाती है। भदोही के दुलहीपुर गाँव से उठी यह आवाज मात्र एक क्षेत्र की व्यथा नहीं है, बल्कि यह उस पूरे देश का कड़वा सच है, जहाँ विकास के नाम पर तालाबों का निर्माण तो कर दिया जाता है, लेकिन उनमें पानी भरने की मूलभूत व्यवस्था को सिरे से नकार दिया जाता है। देश के ग्रामीण अंचलों में तालाबों की स्थिति आज एक गंभीर मानवीय और पर्यावरणीय संकट की ओर इशारा कर रही है। हमारे देश में सदियों से तालाब सामुदायिक जीवन का केंद्र रहे हैं। ये न केवल भू-जल स्तर को बनाए रखने के प्राकृतिक स्रोत थे, बल्कि भीषण गर्मी में मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए जीवनदायिनी भी थे। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हमने विकास की आधुनिक दौड़ में इन पारंपरिक जल निकायों को एक ऐसे 'प्रोजेक्ट' में बदल दिया है, जिसका उद्देश्य जल संरक्षण नहीं, बल्कि केवल धन का बंदरबांट करना रह गया है।
हजारों तालाबों की खुदाई और जीर्णोद्धार के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये आवंटित होते हैं। कागजों पर तालाब गहरे किए जाते हैं, उनके चारों ओर मेड़बंदी होती है और शिलापट लगाए जाते हैं। लेकिन धरातल पर उन तालाबों के किनारों को ही बेचकर या उन्हें अनुपयोगी बनाकर छोड़ दिया जाता है। जब गर्मी का मौसम आता है और गाँव के मवेशी, जो हमारी अर्थव्यवस्था और संस्कृति का आधार हैं, पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि हमने विकास के साथ कितना बड़ा धोखा किया है। यह स्थिति न केवल संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है, बल्कि यह उन सरकारी तंत्रों की विफलता भी है, जो अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हुए हैं। तालाबों में पानी न होना यह प्रमाणित करता है कि कार्य केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए किया गया था। निर्माण के दौरान जो मिट्टी निकाली जाती है, उसे बेचा जाना और निर्माण की गुणवत्ता से समझौता करना यह साबित करता है कि शासन का ध्यान जनहित पर नहीं, बल्कि अपनी तिजोरियां भरने पर है।
यह जल संकट एक ऐसी आग है जो आने वाले समय में विकराल रूप ले सकती है। यदि हमने अभी भी उन लोगों को जवाबदेह नहीं बनाया जिन्होंने सरकारी धन का दुरुपयोग किया है, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल सूखे और मृत तालाब ही सौंपेंगे। समय की मांग है कि पूरे देश में व्याप्त इस तालाब-भ्रष्टाचार के तंत्र को ध्वस्त किया जाए। ग्राम सभा से लेकर ब्लॉक और जिला स्तर तक के उन सभी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए, जिनकी देखरेख में इन तालाबों का निर्माण हुआ था। केवल कार्यवाही ही काफी नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी हो। जो तालाब सूखे पड़े हैं, उनमें बोरिंग या जल परिवहन के माध्यम से तत्काल पानी भरने की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि उन बेजुबान जानवरों को बचाया जा सके, जो अपनी प्यास बुझाने के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैला सकते।
अंततः, जल संरक्षण केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक नैतिक कर्तव्य है। यह खबर, जो दुलहीपुर से निकली है, वह देश के हर उस गाँव के लिए एक चेतावनी है जहाँ तालाब केवल शो-पीस बने हुए हैं। यदि तंत्र नहीं जागता, तो जनता को अपनी शक्ति पहचाननी होगी और उन लोगों को बेनकाब करना होगा जिन्होंने जल के नाम पर पाप किया है। जो लोग समाज के हित में तालाबों को पुनर्जीवित करने में आगे आएंगे, उनका सम्मान करना और जो इसे केवल कमाई का जरिया बनाएंगे, उन्हें समाज और कानून के कटघरे में खड़ा करना—यही आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विकास का मापदंड कंक्रीट के शिलापट नहीं, बल्कि भरे हुए तालाब और उसमें तृप्त होते जीव-जंतु होने चाहिए। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी प्यास और जानवरों की तड़प को नजरअंदाज करना बंद करें और इस व्यवस्था को आईना दिखाएं।