भदोही के दुलहीपुर में 'विकास' का काला सच: जाँच के नाम पर हुआ फर्जीवाड़े का महा-खेल, अधिकारियों ने रचा साजिश का जाल
भदोही: जनपद के दुलहीपुर गाँव में विकास कार्यों की हकीकत इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। यहाँ 'विकास' की तस्वीर वैसी नहीं है जैसी फाइलों में दिखाई जा रही है। ग्रामीणों की शिकायत पर हुई कथित जाँच ने एक ऐसी परत खोली है, जिसने प्रशासन की ईमानदारी पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
अधिकारी पहुँचे 'दरबार', या रची गई जाँच की पटकथा?
आरोप है कि विभाग द्वारा की गई जाँच पूरी तरह से एकतरफा और संदिग्ध है। ग्रामीणों का कहना है कि जाँच करने वाले अधिकारी ने शायद धरातल पर उतरने के बजाय कहीं बैठकर ही रिपोर्ट तैयार कर ली। जब गाँव में सड़क कहाँ तक प्रस्तावित थी और कहाँ तक बनाई गई, इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है, तो फिर यह जाँच किस आधार पर पूरी हो गई? यह अपने आप में एक बड़ा रहस्य है।
हस्ताक्षर का 'फर्जीवाड़ा': क्या ग्रामीणों को मोहरा बनाया गया?
विभाग द्वारा जिलाधिकारी को सौंपी गई रिपोर्ट में एक सहमति पत्र संलग्न है, जिस पर कई ग्रामीणों के हस्ताक्षर होने का दावा किया गया है। लेकिन, जब मामले की तह तक जाकर पड़ताल की गई, तो पता चला कि उनमें से कई लोगों ने तो हस्ताक्षर किए ही नहीं हैं! विनय दुबे जैसे ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके नाम का इस्तेमाल फर्जी तरीके से किया गया है।
'पढ़े-लिखे नासमझ' और भ्रष्टाचार की जुगलबंदी
हैरानी की बात यह है कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता को लेकर जहाँ पूरे गाँव को जागरूक होना चाहिए था, वहीं कुछ लोग बिना सोचे-समझे इस भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों का यह 'हस्ताक्षर अभियान' न केवल उनके अधिकारों के प्रति अनभिज्ञता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि कैसे चंद 'कमीशनखोरों' के लालच में गाँव के विकास की बलि दी जा रही है।
अब जाँच की घेरे में होंगे हस्ताक्षर करने वाले भी
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अब इस मामले में केवल अधिकारी और ठेकेदार ही नहीं, बल्कि उन हस्ताक्षरों की भी गहन जाँच होगी जो सहमति पत्र में दर्ज हैं। क्या उन लोगों ने सचमुच हस्ताक्षर किए हैं, या उनके नाम का दुरुपयोग किया गया है? यह खुलासा होते ही हड़कंप मचना तय है।
प्रशासन को चेतावनी: खेल अब नहीं चलेगा
इस पूरे फर्जीवाड़े की शिकायत जिलाधिकारी से कर दी गई है। ग्रामीणों का संकल्प है कि इस बार मामला किसी 'बंद कमरे की जाँच' में खत्म नहीं होगा। यदि आवश्यकता पड़ी, तो फर्जी हस्ताक्षर करने वालों और इसमें संलिप्त अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही के लिए उच्च न्यायालय तक का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इस 'फर्जीवाड़े के महा-खेल' को गंभीरता से लेता है, या फिर फाइलों में धूल डालकर दोषियों को बचाने का सिलसिला जारी रहेगा?
[संवाददाता: कन्हैयालाल दुबे]