सरकारी दावों की खुली पोल: 12 वर्षों से फाइलों में दफन है दिव्यांग की आस
भदोही के भिड़िउरा गांव में बदहाली का शिकार एक परिवार; आवास और राशन कार्ड के लिए काट रहे सरकारी दफ्तरों के चक्कर
भदोही (ज्ञानपुर):डिजिटल इंडिया और 'सबका साथ-साथ विकास' के नारों के बीच जमीनी हकीकत आज भी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। जनपद के ज्ञानपुर विधानसभा अंतर्गत भिड़िउरा गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है, जहाँ एक दिव्यांग व्यक्ति पिछले 12 सालों से बुनियादी सुविधाओं के लिए सिस्टम की चौखट पर सिर पटक रहा है, लेकिन उसे आश्वासन के सिवा कुछ हासिल नहीं हुआ।
कच्चे मकान में गुजर-बसर, बारिश में टपकती छत
पीड़ित नितिन कुमार पांडे ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि वह चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हैं। उनका घर जर्जर अवस्था में है, जहाँ छत से पानी टपकता है और दीवारें कभी भी गिर सकती हैं। 2013 में तत्कालीन जिलाधिकारी को लोहिया आवास योजना के तहत आवेदन देने के बावजूद आज तक उन्हें पक्का आवास नसीब नहीं हुआ। नितिन का कहना है कि "जब बारिश होती है, तो पूरा परिवार डर के साये में जीने को मजबूर होता है।"
राशन कार्ड और शौचालय की सुविधा से भी वंचित
विडंबना यह है कि पीड़ित के पास लाल (अंत्योदय) कार्ड तक नहीं है, जिससे उन्हें पर्याप्त राशन मिल सके। शौचालय के नाम पर केवल कागजी खानापूर्ति हुई है। दबंगों और आपसी विवाद के कारण शौचालय का निर्माण बीच में ही रोक दिया गया, जिससे दिव्यांग को दैनिक कार्यों के लिए भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनके पास मौजूद पुरानी ट्राई-साइकिल भी अब जवाब दे चुकी है, जिससे उनका आवागमन पूरी तरह बाधित है।
जनप्रतिनिधियों की बेरुखी ने बढ़ाया दर्द
पीड़ित का आरोप है कि उन्होंने स्थानीय जिला पंचायत सदस्य अंजनी शुक्ला और अन्य प्रतिनिधियों से कई बार गुहार लगाई, लेकिन हर बार उनकी समस्या को नजरअंदाज कर दिया गया। बुजुर्ग पिता और छोटे बच्चों के साथ रहने वाले नितिन के पास अब कोई रास्ता नहीं बचा है।
प्रशासन से न्याय की गुहार
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी से मांग की है कि इस अति-विशिष्ट मामले में तत्काल हस्तक्षेप किया जाए। पीड़ित परिवार को मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत घर, अंत्योदय राशन कार्ड और एक मोटराइज्ड ट्राई-साइकिल उपलब्ध कराई जाए, ताकि वह सम्मानजनक जीवन जी सके।
संवाददाता की नजर: यह मामला केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक सुस्ती का परिचायक है जो फाइलों के बोझ तले दबकर एक जरूरतमंद की आवाज को अनसुना कर देती है। देखना होगा कि इस खबर के बाद प्रशासन की नींद टूटती है या नहीं।
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