तेलंगाना के अंधेरे में चीखते जंगल और उजड़ते आशियाने: सत्ता के गलियारों में कब जागेगी संवेदना?

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में एक जिम्मेदार पत्रकार की कलम से
तेलंगाना की शांत रातों में, जब प्रकृति अपनी गोद में विश्राम कर रही थी, तब कुछ हाथों ने अंधेरे का फायदा उठाकर ऐसा अपराध कर डाला, जिसकी गूंज सदियों तक इस धरती पर सुनाई देगी। रात के अंधेरे में, चोरी-छिपे, कुल्हाड़ियों और मशीनों की निर्दयी आवाज़ ने हरे-भरे जंगलों को लहूलुहान कर दिया। सिर्फ पेड़ ही नहीं कटे, बल्कि उन असंख्य प्राणियों के घर भी उजाड़ दिए गए, जिन्होंने सदियों से इन वनों को अपना आश्रय माना था। यह सिर्फ पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि जीवन की निर्मम हत्या है, प्रकृति के संतुलन पर एक गहरा आघात है।
यह घटना, जो अंधेरे की ओट में अंजाम दी गई, हमारे शासन-प्रशासन और सरकारों की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। क्या हमारी सतर्कता इतनी कमजोर पड़ गई है कि माफिया रात के अंधेरे में इतने बड़े पैमाने पर वन संपदा को लूट ले जाएं और किसी को कानों-कान खबर न हो? क्या हमारी वन विभाग की चौकसी सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गई है? यह सिर्फ एक क्षेत्र में हुई घटना नहीं है, यह उस नासूर का प्रतीक है जो धीरे-धीरे हमारी प्राकृतिक धरोहर को खोखला कर रहा है।
राज्य सरकार, जिसके कंधों पर प्रदेश की प्राकृतिक संपदा की रक्षा करने का दायित्व है, इस मामले में अपनी आँखें क्यों मूंदे हुए है? क्या सिर्फ खानापूर्ति के लिए कुछ कर्मचारियों को निलंबित कर देना पर्याप्त है? उन बड़े मगरमच्छों पर कब शिकंजा कसा जाएगा, जो पर्दे के पीछे से इस पूरे खेल को संचालित कर रहे हैं? यह समझना मुश्किल है कि इतने बड़े पैमाने पर अवैध कटाई बिना स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत के कैसे संभव हो सकती है। क्या हमारे तंत्र में इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी भ्रष्टाचार की बेल को उखाड़ फेंकने का साहस अब भी बचा है?
वहीं, केंद्र सरकार, जो पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करती है, इस मामले पर चुप्पी क्यों साधे हुए है? क्या राज्य सरकारों की नाकामियों को अनदेखा करना उनकी नीति है? राष्ट्रीय स्तर पर वन और वन्यजीव संरक्षण के लिए बने नियम और कानून क्या सिर्फ शोभा की वस्तु बनकर रह गए हैं? केंद्र सरकार को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए और एक उच्च स्तरीय जांच बिठानी चाहिए, ताकि इस घिनौने कृत्य के असली दोषियों को कानून के कटघरे में खड़ा किया जा सके।
यह सिर्फ जंगल की कटाई का मामला नहीं है, यह उन बेजुबान जानवरों के अधिकारों का हनन है, जिनका इस धरती पर उतना ही हक है जितना हमारा। रात के अंधेरे में जब उनके घर उजड़ गए होंगे, तो उनकी चीखें कितनी भयावह रही होंगी, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। वे कहाँ जाएंगे? कैसे जिएंगे? उनके बच्चों का क्या होगा? यह सवाल हमारी मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने के लिए काफी हैं। क्या विकास का अर्थ सिर्फ कंक्रीट के जंगल खड़े करना है, प्रकृति के हरे-भरे आशियानों को उजाड़ना है?
यह समय आत्ममंथन का है। हमारी नीतियां, हमारी प्राथमिकताएं और हमारी कार्यशैली पर सवाल उठाने का है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ बंजर जमीन और प्रदूषण से भरी हवा सौंपना चाहते हैं? क्या हम उस प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भूल गए हैं, जिसने हमें जीवन दिया है?
तेलंगाना में रात के अंधेरे में जो हुआ, वह एक चेतावनी है। अगर अब भी हम नहीं जागे, अगर अब भी हमने कठोर कदम नहीं उठाए, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे जंगल सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएंगे और वन्यजीव केवल तस्वीरों में दिखाई देंगे। शासन और प्रशासन को इस घटना को एक सबक के तौर पर लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इसके लिए न सिर्फ कठोर कानून बनाने होंगे, बल्कि उनका सख्ती से पालन भी सुनिश्चित करना होगा। साथ ही, आम नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रहना होगा।
यह एक जिम्मेदार पत्रकार की पीड़ा है, एक ऐसे नागरिक की व्यथा है जो अपनी आँखों के सामने प्रकृति को लुटते हुए और बेजुबान जीवों को बेघर होते हुए देख रहा है। उम्मीद है कि सत्ता के गलियारों तक यह आवाज पहुंचेगी और कुछ सार्थक कदम उठाए जाएंगे, ताकि तेलंगाना के अंधेरे में चीखते जंगलों और उजड़ते आशियानों को न्याय मिल सके।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उदयपुर सांसद मन्नालाल रावत को दिया ज्ञापन

सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्पणी करने वालो पर भदोही भाजपा विधायक ने दर्ज कराई प्राथमिकी

भदोही के युवा को मिला "बैंक आफ अमेरिका" में नौकरी,आइये बताते है कौन है वह युवा???।

पहलगाम का शोक डोंबिवली में गहराया: आतंकी हमले में मारे गए तीनों का अंतिम संस्कार, उमड़ा जनसैलाब

जौनपुर : पत्नी का पीछा करते हुए पति को मालूम हुई ऐसी हकीकत, मामला पहुंच गया थाने

वसई: करोड़ों की ड्रग्स फैक्ट्री का भंडाफोड़, तीन गिरफ्तार

बेखौफ दबंगो ने की सारी हदें पार

भदोही : जमीनी विवाद के चलते गोशाला संचालक को मारी गोली, गुस्साए लोगों ने शव लेकर किया सड़क जाम।

वकीलों के बीच विवाद ने लिया हिंसक मोड़: एक अधिवक्ता पर जानलेवा हमला और जातिसूचक धमकी का आरोप

महंत आशीष गिरी ने खुद को क्यों मारी गोली, जाने पूरी खबर