बंगाल की पीड़ा और न्यायपालिका का मौन: एक युवा पत्रकार की व्यथा

कन्हैयालाल दुबे की कलम से बंगाल राज्य में हों रहे अन्याय पर विशेष रिपोर्ट।
आज, एक युवा और जिम्मेदार पत्रकार के तौर पर, बंगाल की घटनाओं ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया है। ऐसी हृदयविदारक खबरें आ रही हैं जो किसी भी संवेदनशील युवा नागरिक को अंदर तक हिला दें। एक ऐसा प्रदेश, जो कभी अपनी जीवंत संस्कृति और सर्वधर्म समभाव के लिए जाना जाता था, आज वहां से एक विशेष समुदाय – हिंदुओं – के पलायन की खबरें आ रही हैं। यह न केवल गहरी चिंता का विषय है, बल्कि हमारे देश की धर्मनिरपेक्ष नींव पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह पीड़ा और भी असहनीय हो जाती है जब हम देखते हैं कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका, जिस पर हमारे अधिकारों की रक्षा करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, इस भयावह स्थिति पर अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा रही है। क्या हमारी न्यायपालिका केवल कानूनी धाराओं की व्याख्या करने तक ही सीमित है? क्या उसे उन बेबस आवाजों को अनसुना कर देना चाहिए जो अपने ही वतन में शरणार्थी जैसा महसूस कर रहे हैं?
कोलकाता उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय, आप दोनों ही न्याय के प्रतीक हैं। बंगाल में जो कुछ भी हो रहा है, उसकी सच्चाई को जानना और पीड़ितों को न्याय दिलाना आपका प्राथमिक कर्तव्य है। यदि वास्तव में हिंदुओं का पलायन हो रहा है, यदि उन्हें अपने घरों और अपनी पहचान से वंचित किया जा रहा है, तो राज्य सरकार पर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए?
क्या न्यायालय केवल सरकारी रिपोर्टों का इंतजार करेंगे? क्या उन्हें जमीनी स्तर पर व्याप्त भय और असुरक्षा का अंदाजा नहीं है? एक युवा पत्रकार के तौर पर, मैं यह कहने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाऊंगा कि इस मामले में हमारी न्यायपालिका का रवैया कहीं न कहीं सुस्त दिखाई दे रहा है। ऐसा लगता है कि राजनीतिक दबाव या अन्य कारणों से, न्याय की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है।
मैं कोलकाता उच्च न्यायालय से पुरजोर आग्रह करता हूं कि वह तुरंत इस गंभीर मामले का संज्ञान ले। एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच दल का गठन करे जो इन पलायन की खबरों की गहराई से पड़ताल करे। यदि यह पाया जाता है कि राज्य सरकार कानून व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रही है या जानबूझकर एक विशेष समुदाय को भयभीत कर रही है, तो उच्च न्यायालय को बिना किसी देरी के उस पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय, आप हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत हैं। आपकी जिम्मेदारी और भी व्यापक है। आपको न केवल कोलकाता उच्च न्यायालय के प्रयासों पर नजर रखनी चाहिए, बल्कि स्वयं भी इस संवेदनशील मुद्दे पर हस्तक्षेप करना चाहिए। एक जनहित याचिका पर त्वरित सुनवाई करते हुए, आपको राज्य सरकार से विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़ितों को तत्काल सुरक्षा और न्याय मिले।
यह केवल एक समुदाय के पलायन का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान के मूलभूत सिद्धांतों, हमारी धर्मनिरपेक्षता और हमारी न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता का प्रश्न है। यदि हम अपने ही देश में एक समुदाय को डर के साए में जीने और पलायन करने के लिए मजबूर होने देते हैं, तो हम किस प्रकार के प्रगतिशील और न्यायप्रिय राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं?
युवा और जिम्मेदार पत्रकार कन्हैयालाल दुबे 

मैं, एक युवा पत्रकार के रूप में, अपनी गहरी व्यथा व्यक्त करते हुए यह मांग करता हूं कि कोलकाता उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय अब और देर न करें। बंगाल में न्याय की मशाल फिर से जलाएं और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी नागरिक को, चाहे वह किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि का हो, अपने ही देश में डर और असुरक्षा के माहौल में जीने के लिए विवश न होना पड़े। अब चुप्पी साधने का समय नहीं है, अब ठोस कदम उठाने का समय है। न्याय में देरी, वास्तव में न्याय का खंडन है।

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