वर्तमान में देश में व्याप्त तनाव: एक गंभीर चिंतन

कन्हैयालाल दुबे पत्रकार 
आज हमारा देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ विभिन्न प्रकार के तनाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। यह चिंता का विषय है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर बढ़ती हुई यह बेचैनी हमारे राष्ट्र की एकता और प्रगति के लिए एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर रही है। इन तनावों की जड़ों को समझना और उनका समाधान ढूंढना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
एक प्रमुख तनाव का क्षेत्र सामाजिक ध्रुवीकरण है। विभिन्न विचारधाराओं और पहचानों के आधार पर समाज स्पष्ट रूप से बंटा हुआ दिखाई देता है। यह विभाजन सार्वजनिक बहसों में कटुता लाता है और संवाद की संभावना को कम करता है। सोशल मीडिया के इस युग में, गलत सूचनाओं और पक्षपातपूर्ण विचारों का तेजी से प्रसार इस ध्रुवीकरण को और भी गहरा कर रहा है। अलग-अलग समूहों के बीच अविश्वास की भावना बढ़ रही है, जिससे सामाजिक समरसता खतरे में पड़ रही है।
आर्थिक असमानता भी एक महत्वपूर्ण कारक है जो देश में तनाव को बढ़ावा दे रही है। एक तरफ जहां कुछ वर्ग विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग अभी भी बुनियादी सुविधाओं और अवसरों के लिए संघर्ष कर रहा है। बेरोजगारी, महंगाई और आय में बढ़ती खाई लोगों में असंतोष पैदा कर रही है। यह आर्थिक असुरक्षा सामाजिक अशांति को जन्म दे सकती है और विकास की समग्र प्रक्रिया को बाधित कर सकती है।
राजनीतिक परिदृश्य भी तनाव से अछूता नहीं है। विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक मतभेद अक्सर कटुता और व्यक्तिगत आक्षेपों में बदल जाते हैं। नीतिगत मुद्दों पर स्वस्थ चर्चा के बजाय, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है। यह न केवल राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों के विश्वास को कम करता है, बल्कि शासन और विकास कार्यों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। चुनावी प्रक्रियाएं भी कभी-कभी ध्रुवीकरण को और बढ़ा देती हैं, जिससे समाज में लंबे समय तक विभाजन बना रहता है।
इसके अतिरिक्त, कुछ क्षेत्रों में सांप्रदायिक और जातीय तनाव भी चिंता का विषय बने हुए हैं। ऐतिहासिक कारणों और निहित स्वार्थों के कारण समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं जो सामाजिक सद्भाव को ठेस पहुंचाती हैं। अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना और बहुसंख्यकों के बीच आशंकाएं, दोनों ही देश के ताने-बाने को कमजोर कर सकती हैं।
इन विभिन्न प्रकार के तनावों का देश के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। सामाजिक अशांति विकास की गति को धीमा कर सकती है, विदेशी निवेश को हतोत्साहित कर सकती है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को धूमिल कर सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हमारे समाज के मूलभूत मूल्यों - सहिष्णुता, भाईचारा और एकता - को कमजोर कर सकती है।
वर्तमान में व्याप्त इन तनावों का समाधान ढूंढना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए सभी हितधारकों - सरकार, राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और प्रत्येक नागरिक - को मिलकर काम करना होगा। संवाद और सहिष्णुता को बढ़ावा देना, आर्थिक असमानता को कम करने के लिए ठोस कदम उठाना, राजनीतिक विमर्श को अधिक रचनात्मक और सम्मानजनक बनाना, और सांप्रदायिक सद्भाव को मजबूत करने के लिए प्रयास करना आवश्यक है।
हमें यह याद रखना होगा कि विविधता हमारी ताकत है, कमजोरी नहीं। विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों का सम्मान करना और सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा देना ही देश को प्रगति और समृद्धि के रास्ते पर ले जा सकता है। यह समय आत्मनिरीक्षण करने और सामूहिक रूप से एक ऐसे भविष्य का निर्माण करने का है जहां हर नागरिक सुरक्षित, सम्मानित और विकास के अवसरों में समान भागीदार महसूस करे। तभी हम वास्तव में एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र बन पाएंगे।

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