कब थमेगा यह खूनखराबा?: पहलगाम की चीत्कार
शांत और सुरम्य पहलगाम, जहां बर्फ से ढके पहाड़ आकाश से बातें करते हैं और हरी-भरी वादियां सुकून का एहसास कराती हैं, कल अचानक चीखों और गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा। बैसरन की हसीन वादी, जिसे प्यार से 'मिनी स्विट्जरलैंड' कहा जाता है, खून से लाल हो गई।
सूरज अपनी स्वर्णिम किरणें बिखेर रहा था और पर्यटक प्रकृति के इस अद्भुत नज़ारे को अपनी आँखों में कैद कर रहे थे। हंसी-खुशी और उत्साह का माहौल था। बच्चे दौड़ रहे थे, युवा तस्वीरें ले रहे थे और बुजुर्ग शांति से इस सुंदरता को निहार रहे थे। किसी को भी उस आने वाले तूफान का अंदाजा नहीं था जो उनकी खुशियों को पल भर में मातम में बदलने वाला था।
तभी, अचानक, शांति भंग हुई। गोलियों की आवाज़ें हवा में गूंजीं। चीख-पुकार मची और भगदड़ मच गई। वर्दी पहने कुछ लोग, जिनके चेहरे पर नफरत और क्रूरता का भाव था, अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे थे। मासूम लोग, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, लेकिन मौत हर तरफ मंडरा रही थी।
नूरजहां, अपने सात साल के बेटे आरिफ का हाथ पकड़े, फूलों से लदी वादियों को निहार रही थी। अगले ही पल, एक गोली आरिफ की पीठ में लगी और वह मां की पकड़ ढीली कर लहूलुहान होकर गिर पड़ा। नूरजहां की चीख आसमान चीर गई, लेकिन उस शोर में उसकी आवाज दब गई।
रमेश और उसकी पत्नी प्रिया हनीमून के लिए पहलगाम आए थे। वे एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले वादियों की सुंदरता में खोए हुए थे। अचानक, गोलियों की बौछार हुई और प्रिया रमेश के बाहों में गिर पड़ी। रमेश ने अपनी पत्नी को बचाने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। प्रिया की आँखों में हमेशा के लिए अंधेरा छा गया।
वह मंजर भयानक था। हर तरफ खून और चीखें थीं। घायल लोग दर्द से कराह रहे थे और अपनों को खोने वाले बिलख रहे थे। प्रकृति की सुंदरता पल भर में नरक में बदल गई थी।
जब गोलियों की आवाजें थमीं, तो हर तरफ मातम छाया हुआ था। बैसरन की हरी-भरी वादियां मासूमों के खून से रंगी हुई थीं। 26 निर्दोष जानें जा चुकी थीं, जिनमें दो विदेशी नागरिक भी शामिल थे, जो इस धरती की सुंदरता देखने आए थे। कई और घायल अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे।
इस कायराना हमले की जिम्मेदारी 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' नामक एक आतंकवादी संगठन ने ली, जो मानवता के दुश्मनों का एक और नकाब है। उन्होंने धर्म के नाम पर निर्दोषों का खून बहाया, यह दिखाते हुए कि उनकी नफरत और हिंसा की कोई सीमा नहीं है।
इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। हर आँख नम है और हर दिल गुस्से से भरा हुआ है। सवाल उठ रहे हैं - कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा? कब तक हमारे मासूम भाई-बहन आतंकवाद की भेंट चढ़ते रहेंगे?
लेकिन इस दुख और गुस्से के बीच, हमें अपने जवानों के मनोबल को बनाए रखना होगा। वे, जो अपनी जान हथेली पर रखकर हमारी रक्षा करते हैं, उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि यह देश उनके साथ खड़ा है। उनकी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। हमें एकजुट होकर इस आतंकवाद के दानव का सामना करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि पहलगाम की चीत्कार आखिरी चीत्कार साबित हो।
यह कहानी सिर्फ कल की हिंसा की नहीं, बल्कि उस अनगिनत दर्द और नुकसान की है जो आतंकवाद ने हमारे देश को दिया है। यह कहानी उन मासूमों की है जिन्होंने अपनी जान गंवाई और उन परिवारों की है जिनकी खुशियां हमेशा के लिए छीन ली गईं। हमें इस कहानी को कभी नहीं भूलना चाहिए और आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई को जारी रखना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई और पहलगाम लहू से न रंगे।
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